Monday, August 24, 2009

एक पत्र चुनाव विजेता के नाम

मननीय महोदय्‌,
इस वर्ष आपको लगातार तीसरी बार जीत हासिल हुई, इस बात का मुझे गर्र्व है। मैं आपसे यह सभी बातें स्वयं मिल कर कहना चाहता था। पर फिर सोचा कि अभी आप गाड़ी वालों, पेट्रोल वालों और लाउडस्पीकर वालों के बिलों की वज+ह से कुछ दिनों तक घर से बाहर नहीं निकलेंगे। आपके घर में रहने की मजबूरी आपकी आदत में तबदील हो जायेगी और इसके बाद आप हमें पाँच वर्षों के बाद ही दर्च्चन दे गें। पर मेरी च्चिकायतें इतनी बड़ी हैं कि मैं पाँच वर्षों तक इंतजार नहीं कर सकता क्या पता तब तक मेरी जीव आत्मा मेरे नच्च्वर शरीर को छोड़कर पलायन कर चुकी हो। मैं आपका शुभचिन्तक हूँ इस कारण आपको आपकी कमियां बताना चाहता हूँ ताकि आप अगले वर्ष पुनः जीत हासिल कर पाँच वर्षों के लिए अपने घर में नागरिकों की चिन्ताओं पर चिन्तन करने के लिए कैद हो सकें और आपके चिन्तन से हमारा उद्धार हो सके।
निच्च्िचत ही आपके घर में इस समय आपके मतदाताओं के द्वारा बुके भेजने का कार्यक्रम चल रहा होगा। पर ध्यान रहे जो आपको जीत की बधाई देते हैं वे अपके मतदाता नहीं होते। मैंने इसी वर्ष से ही अपना नाम मतदाता सूची में लिखवाया और अपने जीवन का पहला बहुमूल्य वोट आपके नाम किया। पर मैं आपकी जीत से बिल्कुल खुच्च नहीं हूँ, क्योंकि आप ने वोट मांगते समय जनता से जो वायदे किये थे वो पूरे होते नहीं दिख रहे। आपने वोट मांगते समय जनता की पीड़ा पर भावुक होकर आँसू बहाए थे जिससे प्रभावित होकर जनता ने आपको वोट दिये और आपने बहुमत से जीत पाई। आपने वायदा किया था कि हमारे शहर में बिजली की कमी है और आप जीतने के बाद एक तार सूरज से सीधे हमारे शहर के लिए खिचवाएंगे। हमारे शहर की सड़कों के खस्ताहाल का गुणगान तो आपने सुना ही होगा आपने कहा था यदि आप जीते तो स्वयं विष्णु अवतार की तरह बुलडोजर पर लद के आयेगें और सड़कों उद्धार स्वयं अपने हाथों से करेगे। आपने अपनी रैली में एक व्यक्ति। जिसके पिता को गुजरे दो बरस हो गये, पूछा था कि आपके पिता का क्या हाल है ? उसने उत्तर दिया था कि स्वर्ग से यहाँ कोई मोबाइल या एस।एम.एस की सुविधा नहीं है जब आप जायें तो आप ही उनकी खबर भिजवा दीजिएगा। आपने कहा था आपके जीतते ही मोबाइल का एक टावर स्वर्ग में भी लगवा देगें।
जब आप इतने पराक्रमी हैं तो आपको इन छोटे मोटे कार्यों को स्वयं करने की क्या आवच्च्यकता है ? आप तो अपने किसी चेले चपाटे को कह कर यह काम करवा सकते हैं। आपसे निवदेन है कि आप इन तुच्छ तृष्णाओं को छोड़ कर मेरे कष्टों की ओर अपना ध्यान दीजिए। हमारे शहर में टैंपो चालकों का आतंक बढ़ता जा रहा है कई बार वे वर्दी वालों से किराया मांगने की भूल कर बैठते हैं। आप उन्हें सचेत कर दें कि वर्दी वाले गुण्डों से गुण्डागर्दी न करें नहीं तो आप से बुरा कोई नहीं होगा। हमारे शहर में देच्ची शराब के ठेके और जुऐं के अड्डो पर आपके वर्दी वाले दूत मनचाहा हफ्ता वसूल करते हैं कृपया उन्हें आदेच्च दें कि हफ्ता की राच्चि को निच्च्िचत किया जाये ताकि आपके सभी दूत प्रसन्न रहें।
एक गुजारिच्च यह भी है कि जब कभी हमें यातायात नियमों को तोड़ते समय पकड़ा जाता है तो चालान से तो हम आपके राज में बच जाते हैं पर वर्दी वाले सिर्फ ५० रुपये में मान जाते हैं। कितना समय हो गया आपका राज आये पर उनका भाव बढ़ता ही नहीं, कृपया भाव १०० रुपये करवाये ताकि वर्दी वाले अपने बच्चो को जल्द बाइक दिला सकें।
अन्त में एक अनुरोध यह है कि मन्दिर में अमीरों के लिए आरक्षण की व्यवस्था करवाई जाये उन्हें में पक्तियों न लगा कर सीधे भगवान के दर्च्चन के लिए भेजा जाये।
पत्र समाप्त करते हुए आपसे विनती करूँगा कि मेरी च्चिकायतों पर ध्यान दें तथा आपके लिए अगले चुनाव में जीत की कामना उस ईच्च्वर से करता हूँ।
आपका शुभचिन्तक
देवदास (एक मतदाता)

Thursday, December 11, 2008

विकसित होता प्रेम

न्यून्तम उम्र-१४ वर्ष
शैक्षिक योग्यता-सिर्फ अंगे्रजी अच्छी बोलनी आनी चाहिए
आवच्च्यक वस्तु-लाड़कों के लिए निजी मोबाइल और मोटर बाइक, लड़कियों के लिए सिर्फ निजी मोबाइल
अतिरिक्त आवच्च्यक वस्तुऐं-पिता जी के पैसों का ढेर सारा पेट्रोल
साक्षात्कार की तिथी-१४ फरवरी वर्ष कोई भी हो
साथ लाने के लिए वस्तुएं-कोई डिग्री या प्रमाण पत्र नहीं बस लाल गुलाब और चॉकलेट का डिब्बा
यह योग्याताएं किसी सरकारी या प्राइवेट क्षेत्र में नौकरी पाने के लिए नहीं हैं यह योग्यताएं तो प्रेम के क्षेत्र में अपना पहला कदम रखने के लिए आवच्च्यक हैं। एक बार पहला कदम रख दिया तो फिर तो एक के बाद एक कम्पनी छोड़ कर आप बड़ी कम्पनी तक चलते ही जायेगें, तजुरबा (एक्सपीरियन्स) जो हो जायेगा।
यही है आज की युवा सोच और प्रेम का विकास। समय के परिवर्तन के साथ बहुत सी वस्तुएं बदली उन्हीं में से एक था प्रेम। प्रेम शब्द के अर्थ का भी समय के साथ विकास हुआ। कभी कविताओं में दिखने वाला प्रेम आज बाग-बगीचों, नदी किनारों, चिड़िया घरों, होटलों, रेस्ट्रों, कॉलेजों की केन्टीनों में दिखने लगा है। यह है प्रेम का विकास। इसके पीछे युवा सोच की कड़ी मेहनत है और उस युवा सोच के पीछे कौन हैं ? शायद संगत, शायद सिनेमा, या शायद राष्ट्र का चौथा सतम्भ मीडिया। संचार की देवी मीडिया। मीडिया ने ही देच्च को १४ फरवरी के दिन का तोहफा दिया और साथ ही उसके अर्थ का स्वरुप मूल रुप से बदल दिया।
देच्च में क्या हो रहा है इससे ज्यादा चिन्ता मीडिया को इस बात की होती है कि करीना कपूर के जीवन में क्या हो रहा है ? रॉ के प्रमुख बदले उनका नाम सुनाई भी नहीं दिया पर करीना ने कितने बॉयफ्रैण्ड बदले इसकी खबर सबको दी गई। भारत ने पाकिस्तान से किन मुद्दों पर बात की इससे बड़ी खबर यह बनी कि राखी सावंत ने अपने बॉयफ्रैण्ड अभिषेक को कितने थपड़ मारे हैं। इन्हीं सब को देख कर अपने-अपने फ्रैण्ड बनाने का फैच्चन बन गया है। करीना के बॉयफ्रैण्ड बदलने पर अपने फ्रैण्ड को भी बदलना है पुराना जो हो गया है।
अब तो 1 से पेट नहीं भरता है ये दिल माँगें मोर। १,२,३,४............... बस बस बस यह दिल है कि कोई धर्मच्चाला नहीं जिसमें जितने मुसाफिर आयें उतने ठहर सकें। एक सच्चे प्रेम की चाह में कितनो को ट्राई करना पड़ता है यह तो दिल ही जानता है।
इन सबके पीछे मीडिया के अलावा अभिभावकों की भी जवाबदेही बनती है। अभिभावकों का जीवन इतना वयस्त होता है कि वे अपने बच्चों की तरफ ध्यान नहीं दे पातें हैं। धन कमाने की वयस्तता उन्हें अपने बच्चों से दूर ले जाती है। अपने बच्चों को समझने का और उनसे प्रेम करने का समय ही नहीं निकाल पाते। जो चीज घर से नहीं मिल पाती उसे बाहर ढूँढना पड़ता है। कुछ ऐसी ही पुरानी कहावत है मुझे ठीक से याद नहीं आ रही है। इस प्यार की कमी को पूरा करने के लिए युवा पीढ़ी निकल पड़ती है अपने घर से अपने-अपने वाहनों पर। और फिर ! और फिर शुरु होता है एक इंतजार ज्यादा लम्बा नहीं बस छोटा सा। आप के सोचने की देर है आपको आप जैसे बहुत मिलेगें जो घर से बाहर सच्चे प्यार की खोज में चले आये हैं। युवा कदम सही दिच्चा में आगे बड़ रहें हैं या नहीं यह बताने वाले तो धन कमाने में वयस्त हैं। उन्हें समझने वाले तो अपने पेच्चे में डूबे हैं ऐसे में युवा अपनी सोच को सही मान उस रास्ते पर अपने कदम आगे बड़ा तो देते हैं पर जिस रास्ते की मंजिल ही न हो उस रास्ते का भविष्य क्या सोचा जा सकता है। कुछ के कदम वापस घर को लौटते हैं और कुछ के! कुछ अपने रास्ते पर इतने आगे जा चुके होते हैं कि पीछे मुड़ने पर उन्हें अपना घर नहीं दिखता है। दिखता है तो रस्सी का फंदा, कूदने के लिए नदी और पीटने के लिए अपना माथा। ऐसे में कुछ अपनी किस्मत को कोसते हैं तो कुछ अपने उन मित्रों को जिन के कहने पर उन्होंने यह रास्ता चुना। भीगे होठ से शुरु हुआ कारंवा दिल के अरमां आंसुओं में बह गये पर खत्म।
परिणाम- प्यार में धोखा और माता-पिता के लिए बहुत सा दुखः
हल-सीधा सा रास्ता आत्महत्या। ऐसे में माता-पिता को किस कसूर की सज+ा दी जाती है सिर्फ इतनी कि वो अपने बच्चों को समय नहीं दे पाये और उन्हें समझ नहीं पाये। क्या इस कसूर की ये सज+ाऐं सही हैं ? क्या यह सज+ा कम है या बहुत ज्यादा ? ऐसे में मीडिया का क्या गया ?
वरुण आनन्द

Tuesday, November 25, 2008

एक हिन्दुस्तानी का दिल

मैं एक हिन्दुस्तानी जिसके दिल में एक हिन्दुस्तानी दिल धड़कता है आज अपने देच्चवासियों से कुछ कहना चाहता है। हो सकता है जो मैं कहने जा रहा हूँ वो आपको सही न लगे पर जो आवाज+ मेरे दिल से आयी वही आवाज+ आपके सामने लिख कर बयान रहा हूँ।

हम हिन्दुस्तानी आजादी के ६० साल बाद भी कुछ गमों को नहीं भुला पायें हैं। अंग्रेजों के दिये हुए घावों से अभी तक उभर नहीं पाये हैं। सोने की चिड़िया कहे जाने वाले हमारे देच्च को अंगे्रज लूट कर ले गये। देच्च को बर्बाद कर के भाग गये और देच्च के दो टुकड़े करा गये। सैकड़ों रियासतों में बँटे हिन्दुस्तान में अंग्रेज आये और ३०० सालों तक राज किया। हिन्दुस्तानी अंगे्रजों के जुल्म से इतने त्रस्त हुए कि आपसी दुच्चमनी भुला कर अंगे्रजों के खिलाफ एक जुट खड़े हो गये और अंगे्रजों को दुम दबा कर भागना पड़ा। भले ही आज हिन्दुस्तान के दो टुकड़े हो गये हों पर सैकड़ो टुकड़ों से तो दो ही भले। अंग्रेज हमारे देच्च से धन-दौलत सोना चाँदी ले गये पर अंग्रेजो की वज+ह से ही देच्च वासियों के दिल में एक दूसरे के प्रति जो मुहब्बत जागी। यह मोहब्बहत किसी बहुमूल्य वस्तु से कम है क्या ? भले ही अंग्रेज सोने की चिड़िया हमारे देच्च से ले गये पर उस चिड़िया के कुछ पंख भारत में ही छोड़ गये। यह पंख हैं देच्च की एकता और अखंण्डता, देच्च वासियों का एक दूसरे के प्रति प्रेम।

आजादी के ६० सालों में देच्च में इतने परिवर्तन हुए हैं जितने गुलामी के ३०० सालों में भी नहीं हुए थे। देच्च ने आर्थिक क्षेत्र में बहुत उन्नति की जिसके पीछे कृषि का योगदान सराहनीय है। देच्च में गरीबी की प्रतिच्चतता में बहुत कमी आयी है और यह प्रतिच्चत निरन्तर कम होता जा रहा है। प्रति व्यक्ति आय में १२,४१६ रुपये है जो सुखमय जीवन जीने के लिए पर्याप्त है। विदेच्चियों को भी भारतीय अर्थव्यवस्था पर भरोसा है तभी तो वे अपना धन भारत में बिना किसी डर के लगा रहे हैं। आर्थिक मंदी के इस दौर में अमेरिका पर ऋण का बोझ इतना पड़ा कि वहाँ की कितनी ही कम्पनियों का दीवाला निकल गया और अन्य देच्च पर इस मंदी का इतना असर पड़ा कि वहाँ भुखमरी के हालात पैदा हो गये। ऐसे में भारत उन देच्चों में शामिल है जिन पर इस मंदी की मार सबसे कम पड़ी। इससे उचित देच्च की आर्थिक सुदृढ़ता का उदाहरण मेरे पास नहीं है।

भारत की साक्षरता २००१ की जनगणना के अनुसार ६५।३८ प्रतिच्चत है जो एक देच्च की ठीक-ठाक स्थिति को बतलाती है। प्रबन्ध च्चिक्षा की बात करें तो आईआईएम अहमदाबाद ने विच्च्व के टॉप १०० बिजनेस स्कूलों में ९१वाँ स्थान हासिल किया है और कैरियर के नए अवसरों के मामले में इकानामिस्ट १०० की सूची में दूसरे स्थान पर है। भारत में तकनीकी च्चिक्षा की मिसाल इसी बात से दी जा सकती है कि भारत चांद पर अपने देच्च का ध्वज फहराने वाला दुनिया का छठा देच्च बन गया है। इससे पहले सिर्फ अमेरिका, रूस, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी, चीन और जापान जैसे विकसित देच्चों के ध्वज ही चांद पर लहरा रहे थे। अब एक विकासच्चील देच्च का भी नाम इन नामचीन देच्चों की सूची में शामिल हो गया जो सभी हिन्दुस्तानियों के लिए गर्व की बात है।

मनोरंजन की दुनिया में भारत की बादच्चाहत इन सभी क्षेत्रों से भी आगे है। देच्च की अभी तक दो फिल्में आस्कर के लिए नामांकित हो चुकीं हैं। देच्च में सिनेमा का कारोबार दुनिया में दूसरे स्थान पर है।

इतनी सब खूबियों के बाद भी क्या कारण है कि भारत अभी तक सिर्फ विकासच्चील देच्चों की कतार में ही है विकसित राष्ट्रों की सूची में शामिल नहीं हुआ। पहली नज+र में लाचार राजनीतिक संरचना और ढ़ीली न्याय प्रणाली को इसके लिए दोषी ठहराया जा सकता है। देच्च में फैलते आतंकवाद के लिए आप भी इसी को दोषी ठहराते होगें।

पर हमारे देच्च को बर्बाद करने के लिए तो किसी बाहरी ताकत या किसी आतंकवाद समूह की जरुरत नहीं है। यह काम तो हम हिन्दुस्तानी बखूबी संभाल रहे हैं। हमारे देच्च में आतंकवाद की समस्या सबसे प्रबल है पर उससे भी बड़ी समस्या क्षेत्रवाद और धर्मवाद की है। हमारे दिलों में देच्चवाद की भावना न जाने कब क्षेत्रवाद और धर्मवाद में बदल गई। कुछ राजनीतिक पार्टियां अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने के लिए लोगों को धर्म और क्षेत्र के रुप में बाँट रहीं हैं और इससे नुकसान किसी राजनीतिक पार्टी या राजनेता का नहीं देच्च का हो रहा है। राजनीतिक पार्टियों का क्या है चुनाव को आता देख किसी मुद्दे पर अपना चुनाव प्रचार करेंगी कभी धर्म के नाम पर तो कभी क्षेत्र के नाम पर। हिन्दुस्तानी भाईंयों को आपस में ही लड़वायेगीं और खुद लाभ के रुप में लोगों के वोट खयेगीं।

इसलिए भारत को बर्बाद करने के लिए किसी विदेच्ची ताकत या किसी आतंकी गिरोह की कोई जरुरत नहीं है इसके लिए तो तानाच्चाही करने वाली दो-चार राजनीतिक पार्टियां और उनके दिखाये गये मार्ग पर चलने वाले कुछ लोग चाहिए। बस इन्हीं से भारत को बर्बाद करने का काम हो जायेगा।

आज हर किसी की जुबान से बस यह सुनाई देता है कि मैं हिन्दू हूँ, वो मुस्लमान है, तुम सिख हो या हम उत्तर भारतीय हैैंं और तुम दक्षिण भारतीय। कोई भी यह नहीं कहता कि मैं हिन्दुस्तानी हूँ, हिन्दुस्तान का रहने वाला हूँ। देच्च में देच्चवाद का अकाल पड़ने लगा है और धर्मवाद और क्षेत्रवाद की बाढ़ सी आयी हुई है। यदि जल्द ही इस बाढ़ पर बांध नहीं बाधां गया तो यह बाढ़ देच्च को जातिवाद, भ्रष्टाचार आदि नामों के रोग से ग्रस्त करके जायेगी जिसका नतीजा यह होगा कि फिर कोई दूसरा देच्च हममें देच्चवाद की भावना जगाने के लिए हमारे देच्च पर ३०० या उससे भी कही अधिक वर्ष तक राज करेगा और सोने की चिड़िया के नुचे हुए पंख भी अपने साथ ले जायेगा।

Monday, November 10, 2008

मेरा दुखः

कई दिनों से मैंने कोई लेख नहीं लिखा। इसका कारण है मेरा दुखः। मैं हर दुखः का सामना मुस्कुरा के करता हूँ, भगवान ने मुझे कुछ ऐसा ही बनाया है। पर इन दिनों जो दुखः मुझे घेरे हुए है उसका सामना मैं नहीं कर पा रहा हूँ। शायद इसी कारण से कुछ लिख भी नहीं पा रहा हूँ। दो महान भारतीय खिलाड़ियों का सन्यास मेरे दुखः का कारण है। दादा और जंबो अब भारतीय टीम में नहीं खेलेगें इससे बड़े दुखः की बात मेरे लिए और क्या हो सकती है। दादा हमेच्चा से ही मेरे प्रीय बल्लेबाज रहें हैं और जंबो की तारीफ मेरे मुँह से छोटे मुँह बड़ी बात होगी। इन दोनों खिलाड़ियों ने अपने जीवन के कई साल भारत की सेवा में बितायें हैं। भारतीय टीम में इनका योगदान कभी भी भुलाया नहीं जा सकेगा और इन दोनों खिलाड़ियों को कौन भारतवासी अपनी यादों से और अपने दिल से निकालना चाहेगा। यह दोनों महान खिलाड़ी humesha हमारें दिलों में रहेगें।
आज मैं दुखीः हूँ पर रो नहीं रहा हूँ। जरुरी नहीं है कि दुखी होने पर आँखों से आँसू निकलें। आज मेरे आँसू मेरी आँखों से नहीं मेरी कलम से निकल रहें हैं। पर मैं अपने दुखः को यह सोच कर कम कर लेता हूँ कि जो आया है वो जायेगा भी। दादा और जंबों ने भारतीय क्रिकेट टीम की बहुत सेवा की अब इतना तो हक बनता ही है वो आराम करें। शायद यही सोच कर मैं अपने दुखः को कम करता हूँ और उनका भावी जीवन सुखमय हो इसकी कामना भगवान से करता हूँ। उनके सुख को अपने दुखः से ज्यादा देख कर मैं अपने दुखः को कम करुँगा।
मैंने अपने दुखः को आप के साथ बाँटा क्योंकि मैं यह मानता हूँ कि एक अच्छा साथी दुखः को आधा और सुख को दो गुना कर देता है। आप के साथ से मेरा दुखः कम हो जायेगा। मैंने आप को अपने दुखः में शमिल किया इस बात के लिए मैं आप से माफी चाहता हूँ पर इस बात का वायदा करताा हूँ कि अपने सुख मैं सबसे पहले आप को ही शामिल करुँगा।