भारतीय पत्रकारिता के इतिहास के पन्नों पर से अगर धूल हटाये ंतो हमें पता चलेगा कि एक ऐसा दौर भी था जब पत्रकारिता धन कमाने के लिए नहीं की जाती थी। उस समय देच्च को आजादी दिलाना पत्रकारिता का मूल मकसद था। वो समय था जब पत्रकारिता में किसी ने भी व्यवसाय का चेहरा नहीं देखा था अपितु यह एक माध्यम था जनसामान्य तक अपनी बात पहुंचाने का। भारत को आजादी दिलाने के पीछे पत्रकारिता ने कम योगदान नहीं दिया है।
देच्च को आजादी मिली और पत्रों का ण्क मकसद पूरा हुआ, पर अब पत्रकारिता क्यों जिन्दा है ? सबको लगता है पत्रकारिता का कार्य जनता को सूचना देना और वर्तमान घटनाओं से अवगत कराना है। वास्तव में यह पत्रकारिता का मकसद तो है पर मूल नहीं। पत्रकारिता के पास एक मूल मकसद अभी भी है, पर यह 20वीं शताब्दी नहीं है, यह 21वीं सदी है आधुनिक युग, विज्ञान का युग। समय बदल चुका है तो पुराना मकसद कैसे बरकरार रहे। आज के स्वतंत्र और अपेक्षाकृत विकसित भारत में पत्रकारिता का स्वरूप बदल चुका है इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता। पत्रकारिता केवल व्यवसाय बन गया है यह कहना गलत नहीं है तो पूरी तरह से यही भी नहीं है परन्तु इस वाक्य को पूर्ण सत्य बनने में ज्यादा समय भी नहीं है। धीरे-धीरे ही सही पत्रकारिता की भावना समाप्त हो रही है और एक नई किस्म की पत्रकारिता जन्म लेने लगी है। अब सवाल मूल पत्रकारिता को मौत से बचाना है। मैंने दो बार पत्रकारिता शब्द का प्रयोग किया। दोनो शब्दों में अन्तर है पर ज्यादा नहीं। पहली पत्रकारिता जो मृत्यु की ओर अपने कदम बढ़ा चुकी है वो है सफेद कागज पर लिखे काले शब्द जो देच्च का वास्तविक हाल बयान करते हैं और दूसरी पत्रकारिता जो जन्म ले चुकी है उसका अर्थ है हरे कागज पर छपे नम्बर जो देच्च के वर्तमान हाल के लिए जिम्मेदार हैं। वर्तमान में पत्रकारिता का व्यावसायिकता के प्रति लगाव देखते ही बनता है। विज्ञापन और उससे प्राप्त धन आज पत्रकारिता को नए आयाम दे रहा है। आज मीडिया केवल राजनीतिक और सामाजिक जानकारियां प्रदान करने का माध्यम नहीं रहा अपितु वह भारतीय राजनीति का एक अंग बन चुका है।
वर्तमान पत्रकारिता और वास्तविक पत्रकारिता में अन्तर समझाने के लिए एक वाक्य ÷पहले निकलने वाले पत्रों के पीछे किसी व्यक्ति अथवा संस्था के कठिन प्रयास थे और वर्तमान में निकलने वाले पत्रों के पीछे है किसी बड़े व्यवसायी की पूंजी और उसके पीछे है कोई सपोर्टिव पार्टी। सपोर्टिव पार्टी को साथ रखने के लिए आवच्च्यक है कन्धा पत्र का और बन्दूक पार्टी की अर्थात् कागज समाचारपत्र का और शब्द सपोर्टिव पार्टी के।'
बाहर से देखने पर कितनी सच्चाई दिखती है इस क्षेत्र में पर यह सच्चाई वास्तविकता से कोसो दूर है। बिना इस क्षेत्र में जाये वास्तविकता का सही अनुमान लगाना कठिन है। मैं आपकी मद्द करता हूँ आप मेरी मद्द कीजिए। मैं वर्तमान पत्रकारिता से आप का परिचय करवाउंगा और आप उसे सुधारने में मेरी मद्द कीजिए।
वर्तमान पत्रकारिता विज्ञापन और पार्टियों के इर्द-गिर्द घूम रही है वरना कौन मूर्ख है जो 15 रुपये के अखबार को मात्र 3 रुपये में आपको सौंप सकता है। आज एक समाचार पत्र के एक अंक की लागत 10 से 20 रुपये के बीच पड़ती है और रविवार को यह लागत 25 रुपये तक पहुंच जाती है, पर बिक्री मूल्य है कि 3-4 रुपये से अधिक बढ़ता ही नहीं। कारण स्पष्ट है समाचार पत्र आपसे धन नहीं कमाना चाहते वे तो बस आपको अपने पाठकों की गिनती में शामिल करवाना चाहते हैं, ताकि आपकी गिनती अपने विज्ञापन दाताओं के सामने रखें और उनके विज्ञापनो को छापने के लिए अपने पाठको की गिनती का हवाला देकर मुंह मांगी कीमत वसूल सकें। जिन समाचारों को समाचारपत्र में जगह मिलती है उनमे तमाम या तो वे समाचार किसी पार्टी, संस्था अथवा किसी उद्योगपति का अप्रत्यक्ष रूप में प्रचार होता है या उस पत्र का स्वयं को उठाने का प्रयास। वास्तविकता में समाचार कहीं भी नहीं होता है। किसी महान व्यक्ति ने सही कहा है ÷जिन बातों को अखबार में छुपाया जा रहा है वो सब समाचार है बाकी सब प्रचार है।' वर्तमान पत्रकारिता अपने पथ से भटक चुकी है। सभी समाचार पत्र दूसरे समाचार पत्रों से आगे निकलने के लिए सच्ची खबरों से ज्यादा मनोरंजक और मसालेदार खबारों को अपने पत्र का हिस्सा बनना ज्यादा पसंद करते हैं। ऐसा समाचार पत्र पाठको की माँगों पर ही करते हैं। समाचार पत्रों की गरिमा और उसमें सच्ची खबरों को वापस लाने के लिए समाचार पत्रों से पहले हमें खुद में कुछ परिवर्तन लाने पड़ेगें। हमें उन समाचार पत्रों पर ध्यान देना चाहिए जो सच्चाई पर ज्यादा ध्यान देते हैं, जो समाचार पत्र स्वतंत्र हो कर लिखते हैं उनकी लेखनी में किसी पार्टी का पक्ष नहीं लिया जाता है ऐसे पत्रों की वर्तमान स्थिति भले ही खराब हो पर उन्हें हम ही आगे ला सकते हैं। एक बार ऐसे पत्रों का समय वापस आ गया तो सभी पत्रों को अपने पथ पर पर लौटने में अधिक समय नहीं लगेगा, और जब ऐसा हुआ तब विकासच्चील भारत को विकसित बनने में भी अधिक समय नहीं लगेगा, अपने देच्च का नाम विकसित राष्ट्रों में देखना मेरा सपना है और यह तभी संभव है जब आप मेरा साथ दे।
मैंने पत्रकारिता के कुछ वास्तविक पहलुओं से आपका परिचय करवाया। अब मैं आप से अनुमति चाहता हूँ और दूसरी बात जो चाहता हूँ वो यह है कि मैं वर्तमान पत्रकारिता को मूल पत्रकारिता के रुप में पुनः देखना चाहता हूँ और इसके लिए मैं अपनी तरफ से हर संभव प्रयास करूंगा। यदि आप इस कार्य में आप मेरा साथ देना चाहते हैं तो अपने विचार इस विषय पर लिखें, क्योंकि भारतीय पत्रकारिता के मूल पत्रकारिता के रूप में आने से ही भारत का विकास संभव है।
÷मेरे देच्च में पत्रकारिता बहुत बीमार है , यह बात सब जानते हैं पर कोई कुछ करता क्यों नहीं ? सब सोचते हैं कोई दूसरा करेगा पर दूसरा भी आपका भाई है वो कैसे दूसरी बात सोच सकता है। अगर कुछ करना है तो वो हमको करना है क्योंकि यहाँ कोई दूसरा है ही नहीं।'
वरुण आनंद

1 comment:
सुंदर रचना के लिए बधाई स्वीकारें मेरे ब्लॉग पर आपके आगमन के लिए बहुत बहुत धनयबाद नई रचना हैण्ड वाश डे पढने पुन: आमंत्रित हैं
Post a Comment