एक उन्नत च्चिक्षा प्रणाली ही उन्नत राष्ट्र का आधार होती है यदि आधार सुदृढ़ होगा तो निच्च्िचत ही राष्ट्र उन्नत होगा और देच्चवासी खुच्चहाल।
आजादी के साठ साल के बाद भी भारत जैसा कृषि प्रधान देच्च एक विकासच्चील देच्च है ना कि विकसित। इसके कई कारण हो सकते हैं और उन कारणों में कहीं ना कहीं एक कारण प्राचीन और त्रुटि युक्त च्चिक्षा प्रणाली भी है। भारत जो कि अपनी सभी आवच्च्यकताओं की पूर्ति बिना बाहरी राष्ट्रों की मद्द के कर सकता है अन्य राष्ट्रों पर आश्रित है, कारण स्पष्ट है कि आजादी के साठ साल के बाद भी हम आगे आने का सबक नहीं सीख पायें हैं। आगे आने के लिए हमें किसी ना किसी क्षेत्र में सुधार की पहल करने की आवच्च्यकता है। अगर यह सुधार क्षेत्र राष्ट्र का आधार च्चिक्षा प्रणाली हो तो क्या बात है !
हर वर्ष ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत में मार्च, अप्रैल तथा मई महीनों में विद्यार्थी भारी दबाव में रहते हैं। इस दबाव का एक ही कारण है, उनकी परिक्षाएं। परिक्षाएं आवच्च्यक भी हैं क्योंकि सत्र की अन्तिम परिक्षाओं के आधार पर उनके अध्ययन का मूल्यांकन किया जाता है। इस समय विद्यार्थियों का दबाव में होना स्वाभाविक है। उन्हें किसी विषय पर अपनी साल भर की मेहनत का हिसाब एक दिन और उस दिन में भी महज तीन घण्टों में जो देना होता है। सभी विद्यार्थी कामना करते हैं कि उन्हें सफलता अवच्च्य मिले और सम्भव हो तो वे दूसरों से आगे निकल जायें।
विद्यार्थियों पर दबाव तब और बढ़ जाता है जब इस दौड़ में उनकें माता-पिता भी शामिल हो जातें हैं। जहाँ पिता अपने बच्चों के प्राप्त अंकों के सम्बन्ध में अपने मित्रों से बाते करते हैं और उनके सुन्दर भविष्य की कल्पना करते हैं, वहीं मातायें इस विषय पर अपनी सखियों के साथ किटी पार्टियों में बातचीत करते हुए मिल जाती हैं। वे अपने बच्चों के प्राप्तांकों पर उसी प्रकार इतराती हैं जिस प्रकार से अपने महगें आभूषणों और अपनी बनारसी साड़ियों पर। यदि कोई बच्चा उचित अंक अर्जित नहीं कर पाता है तो उसके माता-पिता सोचतें हैं कि वे समाज में किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहे और उनके बच्चे ने उनकी नाक कटवा दी, उनका सिर शर्म से झुकवा दिया।
इन सब बातों के बीच वे भूल जातें हैं कि उनकें बच्चे को किस प्रकार के दबाव और तनाव को वहन करना पड़ता है, पर उन्हें तो सिर्फ अपनी झूठी शानोच्चौकत से प्यार होता है अपने बच्चे से नहीं जो उनकी वास्तविक दौलत है।
कभी-कभी आच्चानुकूल परिणाम नहीं मिलने पर विद्यार्थी बड़े उग्र कदम उठा लेतें हैं जिसका पछतावा उनके माता-पिता जीवन भर करतें हैं और तब उन्हें समझ में आता है कि जो उनकी सच्ची दौलत थी वो तो उनसे छिन गई और रह गई झूठी शानो च्चौकत। विद्यार्थी द्वारा उठाये गये इन कदमों का कारण कहीं ना कहीं उनके माता-पिता की आवच्च्यकता से अधिक उम्मीदें भी होती हैं। कहीं ना कहीं माता-पिता की वजह से ही कोई छात्र अपनी असफलता के कारण मौत को गले लगाता है। मौत के लिए वे ऐसे-ऐसे मार्ग ढूँढ़ता है जिन्हें सामान्य व्यक्ति सोचते हुए भी थर्राह उठे।
इन युवाओं के उग्र कदमों को रोकने के लिए माता-पिता की मानसिकता में परिवर्तन करना आवच्च्यक है ताकि वे अपनी कीमती दौलत को सद्बुद्धि दे सकें और उनके बढ़ते कदमों को रोक सकें।
आई.आई.टी. जैसे उच्च शैक्षिक संस्थानों में बढ़ती आत्मदाह की घटनाओं के पीछे भी शायद यही कारण रहे होगें। जो छात्र 4 लाख परिक्षार्थियों में से उन 3 हजार छात्रों में चुना गया है जो अपना भविष्य आई.आई.टी. के अन्दर बनायेगें क्या उसमे इतनी भी काबलियत नहीं कि वह अपने भविष्य को यहाँ सुधार सके! बिल्कुल है। पर यह काबलियत उनके ऊपर पड़ने वाला दबाव से छुप जाती है और अन्त में अपने को निर्बल समझ कर मौत को गले लगा लेते हैं। इसके पीछे हमारी च्चिक्षा प्रणाली का असन्तुलित होना भी एक कारण है।
दर असल विद्यार्थी परिक्षओं में अर्जित अंकों तथा अन्त में प्राप्त श्रेणी को ही सफलता का मापदण्ड मानते हैं। वे हरेक विषय में सर्वाधिक अंक हासिल करना चाहते हैं। वे सभी विद्यार्थी किसी ना किसी विषय में निपुण होता है पर सभी विषयों में निपुण हो यह आसान बात नहीं है। हर विद्यार्थी को अपने पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम आजाद की बातों पर विचार करना चाहिये। उनका कहना है ''अंक किसी विषय में अर्जित ज्ञान के संकेत मात्र होते हैं, वे चरित्र के मापदण्ड नहीं होते। एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में तुम्हारे विकास के लिए उत्तम नैतिक मूल्यों तथा आचरण को अच्छे अंको का परिपूरक बनाया जाना नितान्त आवच्च्यक है।'' ध्यान दीजिये, वह चरित्र पर बल देते हैं ना कि प्राप्तांको पर।
यद्यपि परीक्षा में प्रदर्च्चन छात्र की साल भर की मेहनत का एक अंच्च मात्र होता है, सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास के अन्य पहलू हैं जिन पर श्रेणी प्रदान करते समय विचार किया जाना चाहिये। इसलिए अध्यापकों के लिए यह आवच्च्यक है कि वे अपने छात्रों को उन सर्वश्रेष्ठ मूल्यों को आत्मसार करने में मद्द करें जो उन्हें जिम्मेदार नागरिक के रूप में वर्द्धित करें। यदि इस पक्ष में हम पिछड़ गये तो सम्भवतः इसका अपयच्च हमारी वर्तमान च्चिक्षा प्रणाली को ही मिलेगा। स्वाधीनता के 60 वर्षों के बाद भी समय के साथ यह बदला नहीं है। वर्धनच्चील पीढ़ी के कल्याण के लिए असंख्य बलिदानों के मूल्य पर अर्जित अपनी आजादी का सदुपयोग हमें अभी भी करना बाकी है।
वरूण आनन्द
Monday, September 29, 2008
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7 comments:
अच्छा लिख रहे हो भईया, लगता हिन्दी सोफ्टवेयर अच्छे से चलना नही आता, किन्तु अभ्यास करते रहना सब ठीक हो जायेगा।
बढ़िया लिखा है और शब्दों को सही लिखने का प्रयास करें.
धन्यवाद.
अच्छा प्रयास किया है आपने। जारी रखें...
स्वागत है आपका हिन्दी ब्लॉग जगत में।
बहुत सुंदर लिखा है. बधाई स्वीकार करें.
Snehsahit swagat hai aapka...bhawishyame aurbhee achha, achha padhna milga...shiksha pranaleeme badlaawkee behad zaroorat hai.Kya maibhee aapke blogpe aake kuchh sujhaw de sakti hun?
word verification pls hata den!!
बहुत अच्छा..... बहुत बहुत बधाई।
आपका चिठ्ठा जगत में स्वागत है निरंतरता की चाहत है ... मेरा आमंत्रण स्वीकारें मेरे चिठ्ठे पर भी पधारें
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